प्रसंगवश : मुझे सारे त्यौहार मनाने हैं

कुछ दिनों पहले की बात है, मैं पिछले साल दिसंबर में बड़ा दिन (क्रिसमस) के त्यौहार पर गिरिजाघर जाने की बात सोच रहा था। जमशेदपुर में बिताए बचपन के दिनों में मिशनरी स्कूल में पढ़ाई करने की वजह से मुझे क्रिसमस का त्यौहार बेहद अच्छा लगता है। हमारे स्कूल में एक चैपेल हुआ करता था और हमारे टीचर्स जिन्हें हम सिस्टर, ब्रदर या फादर पुकारते थे, हमें क्रिसमस के दिन चैपेल में जाने की अनुमति देते थे। हमें केक और कूकीज़ भी खाने को मिल जाया करती थीं, जिसकी वजह से त्यौहार मनाने का हमारा उत्साह भी दुगुना हो जाता था।

इस साल दीपावली का त्यौहार मैंने अपने सास, ससुर, अमृता (मेरी पत्नी) और मेरे प्यारे मित्र आनंदीबाबू के साथ बड़े ही अच्छे तरीके से मनाया था। दीपावली के छह दिनों के बाद छठ का त्यौहार देखने हम पांचों जुहू बीच पर जा पहुंचे थे। समुद्र के किनारे चहलकदमी करते हुए मैंने क्रिसमस त्यौहार मनाने की बात की। अमृता ने सहमति में सिर हिलाया और आनंदी बाबू ने गर्मजोशी से कहा, “हाँ भाई, ढेर सारी मोमबत्तियाँ खरीद लाएँगे और चर्च के अंदर प्रार्थना करते वक़्त जलाएंगे।” मोमबत्तियों की बात मैंने अभी तक सोची नहीं थी सो आनंदीबाबू से उनके इस सुझाव का कारण पूछ बैठा। वे बोले, “अरे! तुम्हें ‘अमर अकबर अन्थोनी’ फिल्म का वह सीन याद नहीं जब अमिताभ बच्चन गिरिजाघर में अपनी मुराद पूरी करने के लिए मोमबत्तियाँ लेकर ईसा मसीह के सामने प्रार्थना करते हैं?

Amar Akbar Anthony-Church

खैर वह दृश्य याद नहीं तो कोई बात नहीं पर कुछ साल पहले रिलीज़ हुई ‘आल दि बेस्ट’ का वो सीन तो याद होगा जब बिपाशा बसु अजय देवगन के साथ गोवा के किसी चर्च के बाहर मोमबत्तियाँ जलाती है। याद है न? ईसाइयों की पूजा पद्धति में ईश्वर के सामने मोमबत्ती जलाना एक मान्य प्रथा है, जैसे हिन्दू लोग दिये जलाते हैं। यह उनकी संस्कृति है।”

आनंदीबाबू फिल्मों के कुछ दृश्यों के आधार पर किसी धर्म और समुदाय की प्रथाओं के बारे में ऐसे अधिकार के साथ बोल रहे थे कि लगता था जैसे एनसाइक्लोपिडिया ब्रिटानिका का सारा ज्ञान अचानक ही उनके दिमाग़ में भर आया हो। मिशनरी स्कूल से पढ़े होने के कारण मुझे यह पता था कि उनकी बात में सच्चाई है, परंतु उनकी सूचना के स्रोत के बारे में सोचकर मुझे थोड़ी गुदगुदी सी हुई – कमर्शियल हिन्दी सिनेमा! बनारस में पले-बढ़े मेरे प्यारे आनंदीबाबू आजतक सिर्फ मंदिरों की सीढ़ियाँ ही चढ़े थे और दूसरे समुदायों की प्रथाओं के बारे में ज्ञान रखना उनसे अपेक्षित भी नहीं था, ऐसे में सिनेमाई दृश्यों के आधार पर उनका ये कथन मुझे रोचक लगा और मैं मुस्कुराने लगा।

आनंदीबाबू जैसे मेरे विचारों को पहचान गए और कहने लगे, “अरे! तुम क्या समझते हो, ये चीज़ें सिर्फ तुम्हें ही पता हैं? बड़े कास्मोपोलिटन बनते हो और सोचते होगे कि मुझ बनारसी को ये चीज़ें नहीं पता होंगी। ध्यान रहे मैंने तुमसे ज़्यादा फिल्में देखी हैं और ज़्यादा साहित्य भी पढ़ी है। ‘वन्स अपौन अ टाइम इन मुंबई’ में इमरान हाशमी का किरदार माहीम दरगाह पर फूलों की चादर चढ़ाने जाता है, वैसे ही कितनी ही फिल्मों में ईद के त्यौहार पर नमाज़ पढ़ने के दृश्य और खीर खाने-खिलाने के रिवाज़ के सीन मेरे जैसे कितने ही दर्शकों के लिए इन प्रथाओं के जानकारी का स्रोत हैं।

हाल की ही फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ में भी तो दो समुदायों की संस्कृति को कितनी खूबी से दिखाया गया था। वरना सोचो हमारे देश में जहां कितने ही प्रदेश और समुदाय के लोग हैं उन्हें एक-दूसरे के संस्कृति के बारे में कैसे सूचना मिलेगी। ज़रा सोचो दक्षिण भारत का कोई सिनेमा प्रेमी ‘परिणिता’, ‘कहानी’, ‘पीकू’ जैसी फिल्मों से दुर्गा पूजा, बंगालियों के परिधान और उनके संस्कृति के बारे में थोड़ा बहुत तो जान ही लेता है। सिनेमा इस दिशा में एक सशक्त माध्यम है।“

Parineeta-Durga Puja

सच ही तो है, लगभग सभी कमर्शियल फिल्में किसी-न-किसी प्रदेश और समुदाय विशेष के बारे में कोई-न-कोई जानकारी तो ज़रूर देता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय पायदान पर उभरने से काफी पहले ही देश की जनता ‘थ्री इडियट्स’ और ‘रामलीला-गोलियों की रासलीला’ जैसी फिल्मों के माध्यम से ये जान गई थी की गुजरातियों का पसंदीदा जलपान खाखरा, फाफड़ा और डोकला हैं। शाहरुख खान के ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ ने तो लुंगी (मुंडु, वेष्टि) को विश्व विख्यात बना दिया है। ये सभी चीज़ें भारतीय संस्कृति के अंश ही तो हैं। मैं यही सब सोच रहा था कि आनंदीबाबू अपने गाना गाने के टैलेंट का बखान करते हुए ‘रंग दे बसंती’ में इस्तेमाल किए गए सिक्खों के मूलमंत्र, ‘इक ओंकार सत्नाम करता पुरख, निर्भाव, निर्वैर अकाल मूरत…’ की धुन गुनगुनाने लगे।

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