प्रसंगवश – शादी की तैयारी

जुलाई 2013 की बात है, गीतांजली एकस्प्रेस से मैं  उतरा ही था कि मेरा बैग उठाने के लिए एक हाथ आगे आ गया। अमूमन ट्रेन की यात्रा में ज्यादातर बार हालत कुछ ऐसी होती है  कि मुझे ही दूसरों का सामान उठाने के लिए मदद करना पड़ता है, ऐसे में मुझे ज़रा आश्चर्य हुआ। पर आश्चर्य अपने पराकाष्ठा पर पहुंच गया जब मैंने मदद करने वाले का चेहरा देखा। मुंबई की बारिश को झेलते हुए आनंदी बाबू मेरे सामने मेरा बैग अपने हाथों में लिए खड़े थे। मुझे भौंचक्का सा अपनी ओर देखते हुए पाकर वे बोले, “इतना लंबा सफर तय करके आ रहे हो, यहाँ खड़े होकर मुझे ताकना बंद करो और घर चलो”।

आज तक आनंदीबाबू सिर्फ एक बार मुझे स्टेशन पर मिलने आए थे।वो वाकया था 2003 का जब मैं BHU से पढ़ाई खत्म कर दिल्ली के लिए रवाना हो रहा था। वे मुझे रुखसत करने आए थे और 10 सालों बाद फिर एक बार वे मुझे स्टेशन पर रिसीव करने आए थे। “क्या बात है? आप मुझे लेने कैसे आ गए, मैं तो वैसे ही घर जानेवाला था, आप घर पर ही मुलाक़ात करने आ जाते,” मैंने कहा।

उन्होंने मेरी बात का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। टैक्सी में बैठने के बाद वे बोले, “कलकत्ता में सब अच्छे से हो गया ना? मैंने जान बूझकर तुम्हें फोन नहीं किया था ताकि तुम सब काम निपटा कर वापस आ जाओ और मैं तुमसे मुखातिब होकर ही सारी बातें सुनूँ”। किसी कन्यादाय पिता को अपनी बेटी की शादी कि इतनी चिंता नहीं रही होगी जितनी आनंदीबाबू को मेरी रही है। हफ्ते भर पहले मुझे कलकत्ता भेजने के लिए भी उन्होंने काफी ज़हमत मोल ली थी।

“हाँ, सारी बातें अच्छे से हो गई, कोई दिक्कत, परेशानी नहीं उठानी पड़ी। अब आप खुशी से बारात में डांस कर सकते हैं,” मैंने जवाब दिया। मेरा जवाब सुनकर उन्होने दीर्घ श्वास छोड़ा। ऐसा मालूम हुआ जैसे सीने पर पड़ा कोई भारी पत्थर सा बोझ हटा दिया गया हो।

“अब तुम्हारी ज़िंदगी में वाक़ई बहुत अच्छे दिन आएंगे। तुम ज़िंदगी में आने वाले इस बड़े “बदलाव” के लिए कमरबद्ध होकर तैयार हो जाओ। कुछ चीज़ें तुम्हें पसंदआएंगी और कुछ ऐसी भी चीज़ें होंगी जिनसे तुम्हें तकलीफ हो सकती है, पर कैसी भी परिस्थिति हो तुम्हें उनका सामना करना पड़ेगा, मुकर नहीं सकते,” आनंदी बाबू कहते जा रहे थे। वैसे तो आनंदी बाबू स्वयं कुँवारे हैं, पर उन्हें इन मामलों में ज्ञान देना बड़ा पसंद आता है। मैंने थोड़ा खीझते हुए कहा, “इतने दिनों तक मेरी शादी के लिए आप मरे जा रहे थे और अब जब मैंने हाँ कर दी है तो आप इन बातों से मुझे डरा रहे हैं। आपको अच्छी बातें कहनी चाहिए। मेरा हौसला बढ़ाना चाहिए और मुझे सकारात्मक बातें कहनी चाहिए,” मैंने प्रतिवाद किया।

मुझे बिदकता देखकर आनंदी बाबू ने अपना रवैय्या बदला और कहने लगे, “अरे भाई मेरी मंशा तुम्हें डराने की नहीं है। मैं तो तुम्हें हक़ीक़त से रूबरू करा रहा था। अमूमन गृहस्थों के जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती ही हैं”। मैं उनके तजुर्बेगार न होने की बात कहना चाहता था परंतु उनका अपमान भी नहीं करना चाहता था इसलिए अपनी भावनाओं को काबू में करने की कोशिश करते हुए मैंने बात को और आगे नहीं बढ़ाया।

दिन गुज़र रहे थे और मेरी रोज़ अपनी होने वाली बीवी के साथ फोन पर लंबी बातों का सिलसिला शुरू हो चुका था। आनंदी बाबू से जब भी बातें होती तो वे मेरी हौसला अफजायी करते, ऐसे में एक दिन Whatsapp पर एक स्कूल के मित्र का एक forwarded मैसेज आया, मेरे वे मित्र पिछले 7 सालों से शादी के बंधन में उलझे हुए थे और अपनी बीवी और दो पुत्र रत्नों के साथ उनकी ज़िंदगी गुज़र रही थी। मैसेज में लिखा था: If Columbus had been married, he might never have discovered America, because he would have had to answer the following questions and listen to such dramatic statements: Where are you going? With whom? Why? How are you going? To discover what? Why only you? What do I do when you are not here? Can I come with you? When will you be back? Will you be home for dinner? What will you bring for me? You deliberately made this plan without me, didn’t you? You seem to be making a lot of these programs lately… Answer me why? I want to go to my mother’s house. I want you to drop me there. I don’t want to come back ever! What do you mean, OK? Why aren’t you stopping me? I don’t understand what this whole ‘discovery’ thing is about. You always do things like this. Last time also you did the same thing! Nowadays you always seem to do this kind of stuff. I still don’t understand what else is left to be discovered!

After all these questions, forget finding America, Columbus may not have reached the front door of his house!

पढ़कर हंसी आई और साथ ही साथ आनंदी बाबू की याद भी।

‘भाग मिलखा भाग’ फिल्म रिलीज़ हो चुकी थी और कॉलेज के दिनों की तरह ही मैंने आनंदी बाबू के साथ नाइट शो का प्लान बना लिया। फिल्म देखने के लिए निकलने से पहले मैंने अपनी fiancée को फोन किया कि रात को बात न हो पाएगी तो मैंने सोचा था कि इस बात पर कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहींहोगी क्योंकि मुझे नाइट शो में फिल्में देखने का 15 सालों का अनुभव है, पर मुझे लगभग 15 मिनटों तक फोन पर ज्ञान प्राप्त होता रहा कि देर रात घरसे बाहर रहना सुरक्षा की दृष्टी से ठीक नहीं है… शाम के शो बढ़िया होते हैं, इत्यादि।

जब मेरे ज्ञान चक्षु नाइट शो के नकारात्मक पक्षों की विवेचना और तर्कों पर खुल रहे थे तब आनंदी बाबू मेरे बगल में खड़े होकर मेरे चेहरे को देखते हुए हंसी में दोहरे हुए जा रहे थे।

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